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डीआरएस: ३ बदलाव २०२६ में
लेख अंतर्दृष्टि

डीआरएस: ३ बदलाव २०२६ में

17 अक्टूबर 2026
क्रिकेट में डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली मैदानी अंपायर के फैसले को तकनीक की सहायता से दोबारा जांचने का तरीका है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अन्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बाजारों में इसका संचालन...

डीआरएस: ३ बदलाव २०२६ में

क्रिकेट में डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली मैदानी अंपायर के फैसले को तकनीक की सहायता से दोबारा जांचने का तरीका है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अन्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बाजारों में इसका संचालन आईसीसी की खेल परिस्थितियों के अनुसार होता है। बल्लेबाजी टीम का खिलाड़ी या फील्डिंग कप्तान सामान्यतः १५ सेकंड के भीतर दोनों हाथों से “टी” का संकेत देकर समीक्षा मांगता है। तीसरा अंपायर हॉक-आई बॉल ट्रैकिंग, अल्ट्राएज ध्वनि विश्लेषण और उपलब्ध होने पर हॉट स्पॉट का उपयोग करता है। एल्बीडब्ल्यू समीक्षा में पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट—तीनों चरण निर्णायक होते हैं, जबकि करीबी परिणाम में अंपायर्स कॉल मूल फैसला बनाए रखती है। टेस्ट, वनडे और टी२० में रिव्यू की संख्या अलग हो सकती है; इसलिए कप्तान को समय, उपलब्ध समीक्षा और मैदानी संकेत देखकर निर्णय लेना चाहिए। क्रिकेट प्रेमी पर डीआरएस समझने का सबसे व्यावहारिक नियम है: पहले अपील का कारण पहचानें, फिर तकनीक की सीमा समझकर समीक्षा लें।

भारतीय क्रिकेट मैदान में कप्तान दोनों हाथों से टी संकेत देते हुए, स्क्रीन पर डीआरएस समीक्षा दिखाई दे रही है

मूल बात क्या है?

डीआरएस का मूल उद्देश्य हर गलती मिटाना नहीं, बल्कि साफ और महत्वपूर्ण अंपायरिंग त्रुटियों को सुधारना है। मैदानी अंपायर पहले निर्णय देता है, फिर समीक्षा अधिकारी उपलब्ध तकनीकी प्रमाणों के आधार पर देखता है कि फैसला बदलने योग्य है या नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि तीसरा अंपायर हर घटना को अपनी पसंद से दोबारा तय करता है; उसे खेल नियम, उपलब्ध फुटेज और समीक्षा प्रोटोकॉल के भीतर रहना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी की आधिकारिक खेल परिस्थितियां डीआरएस के उपयोग, समय सीमा और समीक्षा परिणामों का आधार हैं।

यहां एक बारीक अंतर समझना जरूरी है। यदि मैदानी अंपायर ने बल्लेबाज को आउट दिया और समीक्षा में प्रमाण निर्णायक नहीं है, तो कई मामलों में मूल फैसला बना रहता है। दूसरी ओर, यदि गेंद बल्ले से लगी हो और अल्ट्राएज पर स्पष्ट संकेत मिले, तो नॉट आउट निर्णय बदल सकता है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड और क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया अपने आयोजनों में आईसीसी मानकों के अनुरूप तकनीकी व्यवस्था अपनाते हैं, लेकिन स्थानीय प्रतियोगिता की शर्तें अलग हो सकती हैं। क्रिकेट प्रेमी के पाठकों के लिए व्यावहारिक निष्कर्ष यही है कि टीवी पर दिखने वाला ग्राफिक अंतिम नियम नहीं, बल्कि नियमों की तकनीकी व्याख्या है।

डीआरएस को समझने के लिए तीन स्तर याद रखें:

  1. मैदानी अंपायर का प्रारंभिक निर्णय।
  2. कप्तान या बल्लेबाज की समयबद्ध समीक्षा मांग।
  3. तीसरे अंपायर का तकनीकी प्रमाण और नियमों के आधार पर अंतिम निर्णय।

क्रिकेट के नियमों की पृष्ठभूमि पढ़ने के लिए क्रिकेट अंपायरिंग और नियमों की शुरुआती मार्गदर्शिका उपयोगी संदर्भ हो सकती है।

यदि आप समीक्षा के हर चरण को मैच-स्थिति के साथ समझना चाहते हैं, तो यह विवरण आगे के निर्णयों को काफी स्पष्ट करेगा।

अधिक जानें

खिलाड़ी वास्तव में क्या देखते हैं?

खिलाड़ी मैदान पर तकनीक की पूरी स्क्रीन नहीं देखते; वे मुख्यतः अंपायर का संकेत, गेंद की दिशा, विकेटकीपर की प्रतिक्रिया और गेंदबाज की अपील देखते हैं। आउट दिए जाने पर बल्लेबाज अपने साथी से त्वरित सलाह ले सकता है, जबकि फील्डिंग कप्तान विकेटकीपर, गेंदबाज और स्लिप क्षेत्र के संकेतों पर निर्भर करता है। समीक्षा मांगने की सामान्य समय सीमा १५ सेकंड है, इसलिए लंबी चर्चा जोखिमपूर्ण होती है। संकेत देने के बाद तीसरा अंपायर पहले यह जांचता है कि समीक्षा समय पर और सही व्यक्ति द्वारा मांगी गई थी या नहीं।

कैमरा कोण भी महत्वपूर्ण हैं। सामने से दिखने वाला दृश्य बल्ले और पैड के बीच संपर्क बता सकता है, लेकिन किनारे से आया कोण गेंद की लाइन स्पष्ट कर सकता है। अल्ट्राएज में ध्वनि तरंग और वीडियो फ्रेम साथ रखे जाते हैं; केवल एक हल्की आवाज अपने आप बल्ले का प्रमाण नहीं मानी जानी चाहिए। हॉक-आई गेंद के संभावित रास्ते का गणितीय अनुमान बनाता है, जबकि हॉट स्पॉट संपर्क के तापीय संकेतों को दिखाता है। इन प्रणालियों की सटीकता कैमरा स्थिति, फ्रेम दर, प्रकाश, ध्वनि और गेंद के संपर्क की प्रकृति से प्रभावित हो सकती है।

टीम के लिए समीक्षा लेने की व्यावहारिक प्रक्रिया इस प्रकार है:

  1. पहले देखें कि अपील का विषय कैच, एल्बीडब्ल्यू या रन-आउट है।
  2. उपलब्ध रिव्यू और पारी की स्थिति तुरंत पहचानें।
  3. कप्तान संकेत देने से पहले विकेटकीपर और गेंदबाज की जानकारी लें।
  4. १५ सेकंड की सीमा समाप्त होने से पहले स्पष्ट “टी” संकेत दें।
  5. परिणाम आने के बाद शेष रिव्यू और रणनीति को फिर से गिनें।

यहां एक आम भ्रम दूर करना जरूरी है: टीवी प्रसारण में दिखने वाला “रिव्यू उपलब्ध” संकेत टीम के निर्णय का विकल्प नहीं है। वह केवल शेष अवसर बताता है। इसी तरह, तीसरे अंपायर का निर्णय केवल लोकप्रिय प्रतिक्रिया से नहीं बदलता; वह तकनीकी प्रमाण और खेल परिस्थितियों पर निर्भर करता है। टी२० में कप्तानी रणनीति और मैच प्रबंधन पढ़ने से समीक्षा को व्यापक रणनीति से जोड़ना आसान होगा।

तीसरा अंपायर बड़े समीक्षा कक्ष में अल्ट्राएज तरंग और हॉक-आई ग्राफिक की जांच करते हुए

सबसे महत्वपूर्ण ३ बातें कौन-सी हैं?

डीआरएस में सबसे अधिक असर डालने वाले तीन तत्व हैं—समय सीमा, तकनीकी प्रमाण और अंपायर्स कॉल। समीक्षा सही होने के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं कि दर्शकों को फैसला गलत लगे; उपलब्ध फुटेज को नियमों के अनुसार निर्णायक होना चाहिए। आईसीसी प्रोटोकॉल में तीसरा अंपायर पहले प्रक्रिया की वैधता जांचता है, फिर घटना के प्रकार के अनुसार अलग-अलग तकनीक का उपयोग करता है। इसलिए कैच, एल्बीडब्ल्यू और रन-आउट की समीक्षा एक जैसी नहीं चलती।

पहली बात समय है। कप्तान का “टी” संकेत सामान्यतः १५ सेकंड के अंदर होना चाहिए। समय बीत जाने के बाद खिलाड़ी मैदान पर चर्चा करता रहे, तो अच्छी तकनीकी संभावना भी समीक्षा में नहीं बदलेगी। दूसरी बात प्रमाण की गुणवत्ता है: अल्ट्राएज बल्ले के किनारे का संकेत दे सकता है, पर गेंद और बल्ले के बीच सही समय-संबंध भी देखना पड़ता है। तीसरी बात अंपायर्स कॉल है, जो एल्बीडब्ल्यू जैसी सीमांत स्थितियों में तकनीक की अनुमान-सीमा और मैदानी अंपायर के निर्णय को साथ रखती है।

इन तीन बातों का संक्षिप्त उपयोग इस तरह समझें:

  • समय: समीक्षा तुरंत और निर्धारित सीमा के भीतर मांगें।
  • प्रमाण: आवाज, दृश्य और गेंद की दिशा को अलग-अलग नहीं, साथ में देखें।
  • नियम: अंपायर्स कॉल को समीक्षा की विफलता नहीं, नियम के भीतर परिणाम समझें।

विशेषज्ञों के लिए एक उपयोगी सूचना यह है कि बॉल ट्रैकिंग वास्तविक भविष्य नहीं दिखाती; वह शुरुआती डेटा से गेंद के संभावित आगे के रास्ते का मॉडल बनाती है। यदि गेंद पैड से टकराने के बाद स्टंप तक जाती हुई दिखाई जाती है, तो उस अनुमान की गणना कैमरा कैलिब्रेशन और रिलीज बिंदु जैसे इनपुट पर निर्भर होती है। यही कारण है कि बहुत छोटे अंतर में अंपायर्स कॉल लागू हो सकती है। विकिमीडिया पर निर्णय समीक्षा प्रणाली का परिचय तकनीकी और ऐतिहासिक संदर्भ देता है, हालांकि किसी मैच का अंतिम नियम हमेशा उस प्रतियोगिता की आधिकारिक शर्तें होंगी।

डीआरएस का एक कम चर्चित पहलू यह भी है कि समीक्षा का परिणाम केवल आउट या नॉट आउट नहीं होता। कुछ मामलों में मैदान पर दिया गया निर्णय कायम रहता है, कुछ में बदल जाता है, और कुछ में समीक्षा प्रक्रिया किसी अन्य नियमगत कारण से आगे बढ़ती है। इसलिए स्कोरबोर्ड पर “रिव्यू बचा” या “रिव्यू गंवाया” दिखना हमेशा पूरे घटनाक्रम का सरल सार नहीं होता।

तकनीकी उदाहरणों और समीक्षा संकेतों को एक जगह देखना चाहते हैं, तो नीचे दिया गया संसाधन उपयोगी रहेगा।

विस्तृत जानकारी देखें

एल्बीडब्ल्यू में अंपायर्स कॉल क्यों आती है?

एल्बीडब्ल्यू समीक्षा में अंपायर्स कॉल तब बनी रहती है जब हॉक-आई का अनुमान विकेट से टकराने, इम्पैक्ट या पिचिंग के सीमांत क्षेत्र में हो और तकनीकी प्रमाण मूल फैसले को पूरी तरह पलटने के लिए पर्याप्त न हो। तीसरा अंपायर पहले देखता है कि गेंद कहां पिच हुई, पैड से कहां टकराई और विकेटों पर उसका अनुमानित रास्ता क्या था। इसलिए समीक्षा मांगने के बाद भी मूल आउट या नॉट आउट निर्णय कायम रह सकता है।

एल्बीडब्ल्यू का विश्लेषण तीन क्रमिक प्रश्नों से होता है। पहला, गेंद लेग स्टंप के बाहर पिच हुई या वैध क्षेत्र में? दूसरा, पैड पर संपर्क विकेटों की लाइन में हुआ या नहीं? तीसरा, गेंद स्टंप से टकराती या विकेट के बाहर निकल जाती? बल्लेबाज का शॉट खेलने का प्रयास, संपर्क का स्थान और गेंद की गति भी लागू नियमों के संदर्भ में देखे जाते हैं। यह मान लेना गलत है कि हॉक-आई की नीली या लाल रेखा अपने आप निर्णय है; वे मूल डेटा से बना दृश्य प्रतिनिधित्व हैं।

अंपायर्स कॉल को लेकर तीन सावधानियां रखें:

  1. यह केवल एल्बीडब्ल्यू तक सीमित समझना सही नहीं; संबंधित खेल परिस्थितियां निर्णायक होती हैं।
  2. अंपायर्स कॉल रहने पर समीक्षा सामान्यतः टीम से नहीं जाती, लेकिन प्रतियोगिता के वर्तमान नियम जांचना जरूरी है।
  3. मूल अंपायर का निर्णय आउट था या नॉट आउट, इससे समीक्षा परिणाम की दिशा बदल सकती है।

यहां एक विशिष्ट रणनीतिक निष्कर्ष निकलता है। यदि गेंद स्टंप के किनारे को मामूली रूप से छूती दिखे, तो कप्तान को समीक्षा की सफलता और रिव्यू बचने—दोनों का मूल्यांकन करना चाहिए। टेस्ट मैच की लंबी पारी में बचा हुआ रिव्यू बाद के सत्र में अधिक उपयोगी हो सकता है, जबकि टी२० में अगली गेंद या अगला विकेट अवसर बहुत जल्दी आ सकता है। यही कारण है कि एक ही तकनीकी स्थिति में रोहित शर्मा, पैट कमिंस या जोस बटलर जैसे कप्तानों की रणनीति मैच प्रारूप और स्कोर दबाव के अनुसार अलग दिख सकती है। एल्बीडब्ल्यू नियम और गेंदबाजी लाइन की उन्नत व्याख्या इस अंतर को और स्पष्ट करती है।

“अंपायर्स कॉल” को दर्शक अक्सर तकनीक और अंपायर के बीच संघर्ष मान लेते हैं, लेकिन वास्तविकता अधिक सूक्ष्म है। नियम निर्माता तकनीकी अनुमान की सीमा को स्वीकार करते हुए मैदानी निर्णय को महत्व देते हैं। आईसीसी के नियम और विनियम में समीक्षा व्यवस्था का उद्देश्य स्पष्ट गलतियों को सुधारना है, हर मिलीमीटर के अनुमान को अंपायर से छीनना नहीं। आईसीसी की समीक्षा नीति का सार यही है: “मैदानी अंपायर का निर्णय तभी बदला जाता है जब उपलब्ध प्रमाण स्पष्ट और निर्णायक हो।” इस वाक्य को समझे बिना डीआरएस पर बहस प्रायः अधूरी रहती है।

किन सीमांत स्थितियों में सावधानी चाहिए?

डीआरएस की सीमांत स्थितियों में समय समाप्त होना, समीक्षा का गलत अनुरोध, नो-बॉल का प्रभाव, कैच में जमीन से संपर्क और तकनीकी उपकरण की उपलब्धता शामिल हैं। इन मामलों में परिणाम केवल हॉक-आई या अल्ट्राएज से तय नहीं होता; तीसरा अंपायर घटना का क्रम, नियम और प्रसारण फुटेज भी देखता है। इसलिए दर्शक को हर समीक्षा में एक ही तकनीक दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है।

कैच की समीक्षा में पहले यह देखा जाता है कि गेंद बल्ले से लगी या नहीं, फिर फील्डर ने गेंद को जमीन से पहले नियंत्रित किया या नहीं। स्लिप कैच में उंगलियां गेंद के नीचे थीं या गेंद घास को छू चुकी थी—यह फर्क निर्णायक हो सकता है। रन-आउट और स्टंपिंग में क्रीज, बेल्स और गेंद की स्थिति को फ्रेम-दर-फ्रेम देखा जाता है। यदि गेंद नो-बॉल थी, तो कैच या विकेट का परिणाम उसी आधार पर बदल सकता है; इसीलिए फ्रंट-फुट कैमरा और गेंदबाज का पैर भी समीक्षा का हिस्सा बन सकता है।

ध्यान रखने योग्य कम चर्चित स्थितियां:

  • नो-बॉल: विकेट गिरने से पहले डिलीवरी वैध थी या नहीं, इसकी जांच जरूरी है।
  • कैच: गेंद का बल्ले से संपर्क और जमीन छूने का क्रम अलग-अलग जांचा जाता है।
  • स्टंपिंग: विकेटकीपर के दस्ताने में गेंद आने और बेल गिरने का समय महत्वपूर्ण है।
  • समय सीमा: कप्तान के संकेत में देरी होने पर तकनीकी रूप से सही संदेह भी स्वीकार नहीं हो सकता।
  • उपकरण: किसी कैमरे या सेंसर की अनुपलब्धता में तीसरा अंपायर उपलब्ध प्रमाण तक सीमित रहता है।

एक और महत्वपूर्ण बिंदु समीक्षा गंवाने के नियम हैं। कई अंतरराष्ट्रीय प्रारूपों में असफल समीक्षा टीम के खाते से घटती है, जबकि सफल समीक्षा या अंपायर्स कॉल पर समीक्षा बच सकती है; लेकिन सटीक संख्या टेस्ट, वनडे, टी२० और आयोजन की खेल परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। कई प्रतियोगिताओं में टीम को एक पारी में दो या तीन समीक्षा मिलती हैं, पर इसे सार्वभौमिक नियम मानना जोखिमपूर्ण होगा। २०२६ में किसी विशेष श्रृंखला, जैसे भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया या पाकिस्तान की घरेलू प्रतियोगिता, के लिए आधिकारिक मैच दस्तावेज देखना ही सुरक्षित तरीका है।

तकनीकी व्यवस्था भी हर मैदान पर समान नहीं होती। हॉक-आई, अल्ट्राएज और हॉट स्पॉट की उपलब्धता प्रसारक, आयोजन स्थल और प्रतियोगिता बजट पर निर्भर कर सकती है। हॉट स्पॉट इन्फ्रारेड संकेतों से संपर्क का स्थान दिखाता है, जबकि अल्ट्राएज माइक्रोफोन से ध्वनि पैटर्न पढ़ता है; दोनों के प्रमाण का स्वरूप अलग है। इसलिए “आवाज नहीं आई, मतलब बल्ला नहीं लगा” या “तापीय निशान नहीं दिखा, मतलब संपर्क नहीं हुआ” जैसे निष्कर्ष हमेशा सही नहीं होते।

क्लोज-अप समीक्षा में बल्लेबाज के बल्ले और पैड के बीच गेंद, साथ में नो-बॉल रेखा स्पष्ट दिखाई दे रही है

यदि समीक्षा परिणाम समझने में बार-बार भ्रम होता है, तो अगली मैच-देखने की आदत इस तरह बनाएं: पहले मैदानी निर्णय लिखें, फिर समीक्षा का प्रश्न पहचानें, उसके बाद तकनीक का प्रमाण देखें। इससे भावनात्मक प्रतिक्रिया और नियमगत विश्लेषण अलग हो जाते हैं। क्रिकेट प्रेमी की मैच समीक्षा और खिलाड़ी आंकड़ों वाली सामग्री में भी यही दृष्टिकोण उपयोगी है, क्योंकि एक गलत डीआरएस किसी बल्लेबाज के आउट होने, साझेदारी के टूटने और पूरे मैच के रन-रेट को प्रभावित कर सकता है।

अब अंतिम निष्कर्ष को संक्षेप में जोड़ना उचित होगा।

नियमों का सार पढ़ें

अंतिम फैसला क्या है?

डीआरएस क्रिकेट में अंपायर की जगह लेने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि मैदानी निर्णय की सीमित और नियमबद्ध पुनःजांच है। इसका सही उपयोग करने के लिए कप्तान को १५ सेकंड की समय सीमा, उपलब्ध रिव्यू, गेंद की घटना और तकनीकी प्रमाण—इन चार बातों को एक साथ देखना चाहिए। हॉक-आई एल्बीडब्ल्यू की गेंद-यात्रा का अनुमान देता है, अल्ट्राएज बल्ले और गेंद के संपर्क का ध्वनि संकेत खोजता है, जबकि हॉट स्पॉट तापीय प्रमाण उपलब्ध करा सकता है। इनमें से कोई भी प्रणाली हर परिस्थिति में अकेले अंतिम उत्तर नहीं देती।

सबसे उपयोगी मानसिक मॉडल यह है कि डीआरएस “संदेह होने पर तुरंत समीक्षा” नहीं, बल्कि “निर्णायक प्रमाण मिलने की संभावना पर समीक्षा” है। कैच में गेंद जमीन से छूने का प्रश्न, एल्बीडब्ल्यू में पिचिंग-इम्पैक्ट-विकेट, और रन-आउट में बेल गिरने का समय अलग-अलग जांचे जाते हैं। अंपायर्स कॉल को समझना विशेष रूप से जरूरी है, क्योंकि करीबी एल्बीडब्ल्यू में मूल निर्णय बना रह सकता है और समीक्षा भी सुरक्षित रह सकती है। आईसीसी, बीसीसीआई, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया और ईसीबी की प्रतियोगिताओं में अंतिम संदर्भ हमेशा संबंधित मैच की आधिकारिक खेल परिस्थितियां होंगी।

क्रिकेट प्रेमी के लिए तीन पंक्तियों का व्यावहारिक निष्कर्ष:

  • पहले घटना की श्रेणी पहचानें।
  • फिर उपलब्ध तकनीकी प्रमाण और १५ सेकंड की सीमा देखें।
  • अंत में रिव्यू बचाने और गंवाने का रणनीतिक मूल्य तौलें।

डीआरएस को समझने का यह तरीका दर्शक, कप्तान और विश्लेषक—तीनों के लिए अधिक सटीक है। तकनीक निष्पक्षता बढ़ाती है, लेकिन उसका परिणाम नियमों, डेटा गुणवत्ता और अंपायरिंग प्रक्रिया के संयुक्त प्रयोग से बनता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: क्रिकेट में डीआरएस क्या होता है?

उत्तर: डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली अंपायर के मैदानी फैसले की तकनीकी पुनःजांच करने की व्यवस्था है। इसमें कप्तान या बल्लेबाज सामान्यतः १५ सेकंड के भीतर दोनों हाथों से “टी” संकेत देकर समीक्षा मांगता है। तीसरा अंपायर हॉक-आई, अल्ट्राएज, हॉट स्पॉट और उपलब्ध वीडियो के आधार पर फैसला कायम रखता है या बदलता है। इसका उद्देश्य हर विवाद हटाना नहीं, बल्कि स्पष्ट और महत्वपूर्ण गलतियों को सुधारना है।

प्रश्न: डीआरएस कैसे लिया जाता है?

उत्तर: डीआरएस लेने के लिए टीम को निर्धारित समय के भीतर मैदानी अंपायर को स्पष्ट “टी” संकेत देना होता है। आउट दिए जाने पर बल्लेबाज या उसका साथी संकेत दे सकता है, जबकि नॉट आउट फैसले के विरुद्ध फील्डिंग कप्तान समीक्षा मांगता है। संकेत के बाद तीसरा अंपायर समीक्षा की वैधता, घटना का प्रकार और उपलब्ध तकनीकी प्रमाण जांचता है।

प्रश्न: एल्बीडब्ल्यू में हॉक-आई क्या देखता है?

उत्तर: एल्बीडब्ल्यू में हॉक-आई गेंद की पिचिंग, पैड से इम्पैक्ट और विकेटों की ओर संभावित दिशा देखता है। तीसरा अंपायर पहले जांचता है कि गेंद वैध क्षेत्र में पिच हुई, फिर संपर्क विकेटों की लाइन में था या नहीं और अंत में गेंद स्टंप से टकराती या नहीं। सीमांत अनुमान में अंपायर्स कॉल के कारण मैदानी फैसला कायम रह सकता है।

प्रश्न: अंपायर्स कॉल का डीआरएस में क्या अर्थ है?

उत्तर: अंपायर्स कॉल का अर्थ है कि तकनीकी अनुमान सीमांत है, इसलिए मैदानी अंपायर का मूल फैसला बरकरार रहता है। एल्बीडब्ल्यू में यह प्रायः पिचिंग, इम्पैक्ट या विकेट के अनुमान से जुड़ा होता है। कई खेल परिस्थितियों में अंपायर्स कॉल पर समीक्षा टीम से नहीं घटती, लेकिन सटीक नियम प्रतियोगिता के आधिकारिक दस्तावेज से जांचने चाहिए।

प्रश्न: डीआरएस और तीसरे अंपायर के फैसले में क्या अंतर है?

उत्तर: डीआरएस पूरी समीक्षा प्रणाली है, जबकि तीसरा अंपायर उस प्रणाली के भीतर अंतिम तकनीकी निर्णय देने वाला अधिकारी है। डीआरएस में समीक्षा मांगना, समय सीमा, उपलब्ध रिव्यू और तकनीक शामिल हैं; तीसरा अंपायर प्रमाण की जांच करके निर्णय मैदानी अंपायर को भेजता है। इसलिए दोनों शब्द समान नहीं हैं, भले ही प्रसारण में अक्सर साथ सुनाई दें।

प्रश्न: डीआरएस समीक्षा असफल क्यों हो जाती है?

उत्तर: समीक्षा तब असफल हो सकती है जब तकनीकी प्रमाण मूल फैसले को स्पष्ट रूप से पलटने के लिए पर्याप्त न हो। समय सीमा समाप्त होना, गेंद का बल्ले से संपर्क स्पष्ट न होना, एल्बीडब्ल्यू में अंपायर्स कॉल और कैच में जमीन छूने का संदेह इसके सामान्य कारण हैं। असफल समीक्षा का प्रभाव रिव्यू खाते पर प्रतियोगिता के प्रारूप और खेल परिस्थितियों के अनुसार पड़ सकता है।

प्रश्न: हर क्रिकेट मैच में कितने डीआरएस मिलते हैं?

उत्तर: हर मैच में डीआरएस की संख्या समान नहीं होती; टेस्ट, वनडे, टी२० और घरेलू प्रतियोगिताओं में नियम अलग हो सकते हैं। कई अंतरराष्ट्रीय प्रारूपों में टीम को एक पारी में दो या तीन समीक्षा मिलती हैं, लेकिन २०२६ के किसी खास मैच के लिए आईसीसी या संबंधित बोर्ड की आधिकारिक शर्तें देखना जरूरी है। सफल समीक्षा और अंपायर्स कॉल पर रिव्यू बचने का नियम भी आयोजन के अनुसार जांचना चाहिए।

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